पहले मृत पति की संपत्ति पर पनर्विहित स्त्री के अधिकार – हिंदू विधि के तहत

हिंदू विधि के तहत, किसी महिला के पहले मृत पति की संपत्ति पर अधिकार उसकी वैवाहिक स्थिति, संपत्ति के प्रकार, और उत्तराधिकार कानूनों पर निर्भर करता है। यहां इस विषय से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदुओं और अदालती फैसलों का विश्लेषण किया गया है:

1. मृत पति की संपत्ति पर अधिकार

यदि पति ने वसीयत नहीं छोड़ी है (इंटेस्टेट मृत्यु), तो उसकी संपत्ति का वितरण हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के अनुसार होता है।

• पत्नी क्लास I उत्तराधिकारी होती है और बेटों, बेटियों और मृतक की माँ के साथ संपत्ति में समान अधिकार रखती है।

2. संपत्ति के प्रकार के आधार पर अधिकार

• स्व-अर्जित संपत्ति: पत्नी को पति की स्व-अर्जित संपत्ति में अन्य क्लास I उत्तराधिकारियों के साथ बराबर हिस्सा मिलता है।

• पैतृक संपत्ति: पत्नी को पैतृक संपत्ति में सीधे अधिकार नहीं मिलता, लेकिन उनके बच्चे हिंदू संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में अपना हिस्सा दावा कर सकते हैं।

3. भरण-पोषण का अधिकार

यदि विधवा अपनी देखभाल करने में असमर्थ है, तो वह अपने मृत पति की संपत्ति से भरण-पोषण का दावा कर सकती है।

• यह अधिकार हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 19 के तहत आता है।

4. निवास का अधिकार

विधवा को अपने पति के घर में रहने का अधिकार है, जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं करती।

5. पुनर्विवाह का प्रभाव

• उत्तराधिकार पर प्रभाव: यदि विधवा पुनर्विवाह करती है, तो उसके उत्तराधिकार अधिकार खत्म नहीं होते। एक बार संपत्ति पर अधिकार मिल जाने के बाद, यह अधिकार पूर्ण हो जाता है।

• भरण-पोषण पर प्रभाव: पुनर्विवाह के बाद विधवा का भरण-पोषण का अधिकार समाप्त हो जाता है।

6. वसीयत (Will) का प्रभाव

यदि पति ने वसीयत छोड़ी है, तो संपत्ति उसी के अनुसार वितरित होगी। पत्नी को केवल तभी संपत्ति मिलेगी, जब वसीयत में उसका उल्लेख किया गया हो।

प्रमुख अदालती निर्णय

1. वड्डेबोइना तुलसम्मा बनाम वड्डेबोइना सेशा रेड्डी (1977)

• इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुनर्विवाह के बावजूद, एक विधवा अपने मृत पति की संपत्ति में उत्तराधिकार के अधिकारों को नहीं खोती।

• लेकिन पुनर्विवाह के बाद भरण-पोषण का अधिकार समाप्त हो जाता है।

2. किझके वट्टाकंदीयिल माधवन बनाम थिय्युरकुन्नाथ मीथल जानकी (2024)

• इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 के तहत, पुनर्विवाह से विधवा की संपत्ति के अधिकार समाप्त हो जाते हैं।

• अदालत ने यह स्पष्ट किया कि 1956 के उत्तराधिकार अधिनियम के बावजूद, 1856 का कानून लागू है।

3. भोल उमार बनाम कौसिला (1932)

• इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में माना कि हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 के तहत पुनर्विवाह से विधवा का अपने मृत पति की संपत्ति पर अधिकार खत्म हो जाता है।

4. राम असरे बनाम राम जीत दुबे

• इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दोहराया कि पुनर्विवाह के बाद, विधवा का अधिकार संपत्ति पर समाप्त हो जाता है।

निष्कर्ष

• हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत विधवा को समान उत्तराधिकारी का दर्जा दिया गया है।

• लेकिन यदि विधवा पुनर्विवाह करती है, तो वह संपत्ति में भरण-पोषण का अधिकार खो देती है, जबकि उत्तराधिकार का अधिकार बना रहता है।

• हालांकि, हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 के अनुसार, पुनर्विवाह से उत्तराधिकार के अधिकार समाप्त हो सकते हैं।

अंत में, इन अधिकारों का उपयोग अदालती आदेशों और परिस्थितियों के अनुसार होता है। किसी भी विवादित मामले में विशेषज्ञ कानूनी सलाह लेना जरूरी है।