धारा 164 CrPC मे और परीक्षण के दौरान बयान मे भिन्नता होने पर न्यायालय किस बयान पर विश्वास कर सकता है ?
धारा 164 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत दिए गए बयान और परीक्षण (trial) के दौरान दिए गए बयान में भिन्नता होने पर, न्यायालय को यह तय करना होता है कि किस बयान पर विश्वास किया जाए। इसका निर्धारण विभिन्न कारकों और न्यायिक दृष्टिकोण के आधार पर किया जाता है।
- न्यायालय किस बयान पर विश्वास कर सकता है?
न्यायालय का निर्णय निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है—
(A) बयान की स्वेच्छा और विश्वसनीयता
• यदि धारा 164 CrPC के तहत दिया गया बयान स्वेच्छा से और बिना किसी दबाव के दर्ज किया गया था, और परीक्षण के दौरान गवाह दबाव या डर के कारण अपने बयान से मुकर गया, तो न्यायालय 164 CrPC के बयान को प्राथमिकता दे सकता है।
• लेकिन यदि परीक्षण के दौरान दिया गया बयान अधिक सुसंगत और तार्किक है, तो न्यायालय उस पर भरोसा कर सकता है।
(B) शत्रुतापूर्ण गवाह (Hostile Witness) की स्थिति
• यदि गवाह परीक्षण के दौरान अपने पहले के बयान से पूरी तरह मुकर जाता है, तो अभियोजन पक्ष न्यायालय से उसे Hostile Witness घोषित करने की मांग कर सकता है।
• ऐसे मामलों में, न्यायालय दोनों बयानों की समीक्षा करता है और यह तय करता है कि कौन सा अधिक विश्वसनीय है।
(C) साक्ष्य अधिनियम की प्रासंगिक धाराएँ
(i) धारा 145 भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872
• इस धारा के तहत, यदि गवाह अपने पहले के बयान से भिन्न बयान देता है, तो बचाव पक्ष गवाह की जिरह (Cross-Examination) कर सकता है और विरोधाभासों को उजागर कर सकता है।
• यदि गवाह के बयान में गंभीर भिन्नता पाई जाती है, तो न्यायालय उसे अविश्वसनीय मान सकता है।
(ii) धारा 157 भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872
• यदि गवाह परीक्षण के दौरान बयान बदलता है, तो अभियोजन पक्ष उसके धारा 164 CrPC के बयान को पुष्टिकरण (Corroboration) के लिए उपयोग कर सकता है।
• यदि न्यायालय को लगता है कि 164 CrPC के बयान को अन्य साक्ष्यों से समर्थन मिल रहा है, तो वह इसे अधिक महत्व दे सकता है।
(D) परिस्थितिजन्य साक्ष्य और न्यायालय का विवेक
• न्यायालय यह देखेगा कि कौन सा बयान परिस्थितियों और अन्य साक्ष्यों के अनुरूप है।
• यदि परीक्षण के दौरान दिया गया बयान अधिक स्वाभाविक, तार्किक और अन्य प्रमाणों से मेल खाता है, तो न्यायालय उसी पर भरोसा करेगा।
- प्रासंगिक न्यायिक दृष्टांत (Case Laws)
(A) पांडुरंग कृष्णाजी पाटिल बनाम महाराष्ट्र राज्य (AIR 2002 SC 733)
न्यायालय का अवलोकन:
• न्यायालय ने कहा कि धारा 164 CrPC में दर्ज बयान मात्र एक पूर्ववृत्त (previous statement) होता है और यह स्वतः साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं होता।
• यदि गवाह परीक्षण के दौरान अपने 164 CrPC के बयान से मुकर जाता है, तो केवल 164 CrPC का बयान दोषसिद्धि (conviction) का आधार नहीं बन सकता, जब तक कि अन्य स्वतंत्र साक्ष्य से उसकी पुष्टि न हो।
(B) गोपाल सहाय बनाम बिहार राज्य (AIR 2008 SC 2646)
न्यायालय का अवलोकन:
• न्यायालय ने माना कि यदि गवाह परीक्षण के दौरान बयान बदलता है, तो न्यायालय को गवाह के दोनों बयानों का मूल्यांकन करके तय करना होगा कि कौन सा बयान अधिक विश्वसनीय है।
• यदि 164 CrPC के बयान में सच्चाई की संभावना अधिक है और इसे अन्य साक्ष्यों का समर्थन प्राप्त है, तो न्यायालय उसे अधिक महत्व दे सकता है।
(C) रघुनाथ बनाम कर्नाटक राज्य (AIR 2012 SC 1058)
न्यायालय का अवलोकन:
• न्यायालय ने कहा कि यदि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में सक्षम होता है कि गवाह परीक्षण के दौरान दबाव या भय के कारण बयान बदल रहा है, तो 164 CrPC का बयान अधिक महत्व रख सकता है।
• लेकिन यदि 164 CrPC के बयान में असंगतियाँ हैं, तो न्यायालय परीक्षण के दौरान दिए गए बयान पर भी विचार कर सकता है।
- निष्कर्ष
• यदि गवाह न्यायालय में दबाव, धमकी, या लालच के कारण बयान बदलता है, तो न्यायालय 164 CrPC के बयान को अधिक विश्वसनीय मान सकता है, बशर्ते कि उसे अन्य साक्ष्यों से पुष्टि मिलती हो।
• लेकिन यदि 164 CrPC का बयान अविश्वसनीय लगता है और परीक्षण के दौरान दिया गया बयान अधिक तार्किक और प्रमाणिक प्रतीत होता है, तो न्यायालय परीक्षण के दौरान दिए गए बयान को स्वीकार कर सकता है।
• न्यायालय किसी एक बयान पर स्वतः विश्वास नहीं करता, बल्कि संपूर्ण साक्ष्य, परिस्थितियों और गवाह की विश्वसनीयता का मूल्यांकन करने के बाद निर्णय लेता है।
इसलिए, सिर्फ 164 CrPC के बयान के आधार पर दोषसिद्धि संभव नहीं है जब तक कि उसे अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों का समर्थन न मिले।