धारा 106 साक्ष्य अधिनियम तभी लागू, जब अभियोजन ‘अंतिम बार साथ’ के तथ्य को सिद्ध कर दे।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 एक महत्वपूर्ण किन्तु सीमित दायरे वाला प्रावधान है, जिसका उद्देश्य उन तथ्यों के संबंध में प्रमाण का भार निर्धारित करना है जो विशेष रूप से किसी व्यक्ति के ज्ञान में होते हैं। आपराधिक न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत यह है कि अपराध सिद्ध करने का संपूर्ण भार अभियोजन पर होता है और अभियुक्त को निर्दोष माना जाता है जब तक कि उसके विरुद्ध आरोप संदेह से परे सिद्ध न हो जाए। धारा 106 इस मूल सिद्धांत का अपवाद मात्र है और इसे अभियोजन के दायित्व को कम करने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता।
न्यायालयों ने निरंतर यह स्पष्ट किया है कि धारा 106 तभी लागू होती है जब अभियोजन पहले ऐसे आधारभूत तथ्यों को सिद्ध कर दे, जिनसे यह स्पष्ट हो कि संबंधित तथ्य वास्तव में अभियुक्त के विशेष ज्ञान में है। यदि अभियोजन अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी निभाने में असफल रहता है, तो धारा 106 के माध्यम से अभियुक्त पर कोई अतिरिक्त भार नहीं डाला जा सकता।
“अंतिम बार साथ देखे जाने” का सिद्धांत परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस सिद्धांत के अनुसार यदि यह सिद्ध हो जाए कि अभियुक्त और मृतक को घटना से ठीक पहले साथ देखा गया था, तो यह अपेक्षा की जाती है कि अभियुक्त घटना के संबंध में कोई स्पष्टीकरण दे। किन्तु यह सिद्धांत स्वयं में पूर्ण प्रमाण नहीं है; यह केवल साक्ष्यों की श्रृंखला की एक कड़ी है, जिसे अन्य परिस्थितियों के साथ मिलकर देखा जाना आवश्यक होता है।
हाल के निर्णय में, मनहरण राजवाड़े बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, 2024 में उच्चतम न्यायालय ने इस सिद्धांत को पुनः स्पष्ट और सुदृढ़ किया। न्यायालय ने पाया कि अभियोजन यह स्थापित करने में विफल रहा कि अभियुक्त और मृतका को घटना के समय के आसपास अंतिम बार साथ देखा गया था। गवाहों के बयानों में विरोधाभास था और अभियुक्त की उपस्थिति घटना के समय सिद्ध नहीं हो सकी। ऐसी स्थिति में न्यायालय ने यह माना कि “अंतिम बार साथ” की कड़ी ही सिद्ध नहीं हुई, अतः धारा 106 को लागू करना विधिसम्मत नहीं होगा।
न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक अभियोजन “last seen together” के तथ्य को विश्वसनीय और ठोस साक्ष्यों के माध्यम से सिद्ध नहीं करता, तब तक अभियुक्त पर यह भार नहीं डाला जा सकता कि वह घटना के संबंध में स्पष्टीकरण दे। यदि यह कड़ी अनुपस्थित है, तो अभियोजन की पूरी साक्ष्य श्रृंखला अपूर्ण मानी जाएगी और केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
इस निर्णय से यह सिद्धांत उभरकर सामने आता है कि धारा 106 का प्रयोग केवल तभी संभव है जब अभियोजन पहले एक मजबूत प्रथम दृष्टया मामला स्थापित कर दे। यह भी स्पष्ट किया गया कि मात्र यह तथ्य कि घटना अभियुक्त के घर में हुई या वह मृतक का निकट संबंधी है, अपने आप में पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह दिखाना आवश्यक है कि परिस्थितियाँ ऐसी हैं जिनमें घटना के संबंध में जानकारी स्वाभाविक रूप से अभियुक्त के ही विशेष ज्ञान में आती है।
धारा 106 के अंतर्गत प्रतिकूल अनुमान (adverse inference) भी तभी लगाया जा सकता है जब अभियोजन अपनी ओर से सभी आवश्यक कड़ियाँ स्थापित कर चुका हो। यदि अभियोजन की साक्ष्य श्रृंखला में ही कमी है, तो अभियुक्त के मौन को उसके विरुद्ध नहीं लिया जा सकता।
व्यवहारिक स्तर पर यह देखा गया है कि कई मामलों में जांच एजेंसियाँ धारा 106 का उपयोग अभियोजन की कमजोरियों को ढकने के लिए करने का प्रयास करती हैं। किन्तु न्यायालयों ने बार-बार इस प्रवृत्ति को अस्वीकार किया है और यह स्पष्ट किया है कि आपराधिक मुकदमों में साक्ष्य की श्रृंखला पूर्ण और विश्वसनीय होनी चाहिए। “अंतिम बार साथ” का सिद्धांत इस श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, परन्तु इसे सिद्ध करना अभियोजन की जिम्मेदारी है।
इस प्रकार, मनहरण राजवाड़े (2024) निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि अभियुक्त के अधिकारों की रक्षा हो और दोषसिद्धि केवल ठोस, विश्वसनीय और पूर्ण साक्ष्यों के आधार पर ही की जाए। यह निर्णय आपराधिक न्यायशास्त्र के उस मूल सिद्धांत को पुनः पुष्ट करता है कि संदेह का लाभ सदैव अभियुक्त को दिया जाना चाहिए और अभियोजन अपने दायित्व से बचने के लिए धारा 106 का सहारा नहीं ले सकता।